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প্যাথলজিক্যাল টেস্ট মারাত্মক ক্ষতিকর এবং ভুল তথ্য

প্রথম  কথা  হলো  ডাক্তাররা  তাদের  পেশাগত  ডিগ্রি  অর্জনের  জন্য  যত  ব্যাপক  পড়াশোনা  করেন,  তাতে  ৯৫  ভাগ  রোগ  তারা  কোন  প্রকার  টেস্ট  না  করেই  নির্ণয়  করতে  পারেন।  রোগীকে  পাঁচ-দশটি  প্রশ্ন  করলেই  তিনি  রোগ  সম্পর্কে  নিশ্চিত  হতে  পারেন।  কিন্তু  অধিকাংশ  ক্ষেত্রেই  ডাক্তাররা  এক  বস্তা  টেস্ট  দেন,  তাদের  দ্বায়িত্ব  ফাঁকি  দেওয়ার  জন্য  এবং  ডায়াগনস্টিক  কোম্পানির  কাছ  থেকে  লক্ষ  লক্ষ  টাকা  কমিশন  খাওয়ার  জন্য।  আবার  অনেক  সময়  দেখা  যায়  যে,  ডাক্তার  সাহেব  টেস্ট  দেওয়া  প্রয়োজন  মনে  করেন  না  অথচ  রোগীরাই  জোর  করে  টেস্ট  লিখিয়ে  নিচ্ছেন।  ভাবখানা  এমন  যে,  এসব  টেস্ট  করা  খুবই  জরুরি  কিংবা  শরীরের  জন্য  সাংঘাতিক  উপকারী।  অনেকে  প্রত্যাশা  করতে  পারেন  যে,  চিকিৎসা  কার্যে  গোজামিল  থাকলেও  প্রচলিত  রোগ  নির্ণয়  পদ্ধতি (pathology)  নিশ্চয়  একশ  ভাগ  বিজ্ঞানসম্মত।  কেননা  ডায়াগনস্টিক  সেন্টারগুলোতে  খুবই  উচ্চ  প্রযুক্তির  যন্ত্রপাতি  ব্যবহৃত  হয়ে  থাকে।  নিয়তির  পরিহাস  যে,  বাস্তব  পরিসংখ্যান  এমনটা  প্রমাণ  করে  না।  সমপ্রতি  দুইজন  রোগ  নির্ণয়  বিজ্ঞানী (pathologist)  ৪০০  রোগীর  মৃতদেহ  ময়না  তদন্ত (autopsy- postmortem)  করে  দেখতে  পেয়েছেন  যে,  অর্ধেকেরও  বেশী  রোগীর  ক্ষেত্রে  রোগ  নির্ণয়  ভুল  ছিল।  সহজ  কথায়  বলতে  গেলে  বলতে  হয়  যে,  এদেরকে  ভুল  চিকিৎসা  দেওয়া  হয়েছিল  এবং  আরো  সহজ  কথায়  বলতে  গেলে  বলা  যায়  যে,  ভুল  চিকিৎসার  কারণেই  এদের  মর্মান্তিক  অকালমৃত্যু  হয়েছে।  হায়  ডাক্তার !  হায়  রোগ  নির্ণয় !!  হায়  ঔষধ!!!  এই  দুইজন  প্যাথলজিষ্ট  তাদের  গবেষণায়  আরো  দেখিয়েছেন  যে,  অত্যাধুনিক  সব  প্যাথলজিক্যাল  টেস্ট  করার  পরও  ১৩৪ টি  নিউমোনিয়ার  কেইসে  ৬৫ টির  বেলায়  ডাক্তাররা  রোগ  নির্ণয়  করতে  ব্যর্থ  হয়েছে  এবং  ৫১ টি  হার্ট  এটাকের  ক্ষেত্রে  ১৮ টিতে  রোগ  নির্ণয়  করতে  ব্যর্থ  হয়েছে।  এজন্য  বলা  হয়  যে,  অজ্ঞতা  এখনও  ডাক্তারী  পেশায়  মাশায়াল্লাহ  তার  দাপট  বজায়  রেখেছে।  হ্যাঁ,  প্যাথলজিক্যাল  টেস্ট  হলো  আরেকটি  বড়  ধরণের  প্রতারণা। 

            অধিকাংশ  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  প্যাথলজিক্যাল  টেস্টকে  একশ  বছর  আগেও  “রক্ত  গণনার  ফ্যাশন” (blood  counting  fashion)  নামে  অভিহিত  করে  ঠাট্টা-বিদ্রুপ  করতেন,  এখনও  তাই  মনে  করেন।  কেননা  এগুলো  অধিকাংশ  ক্ষেত্রেই  হাই-টেক  প্রতারণা।  যেমন  ডাক্তাররা  বলবে  যে,  রক্তের  অমুক  উপাদানের  মাত্রা  বেড়ে  গিয়ে  আপনার  অমুক  রোগ  হয়েছে।  তারপর  এক  বস্তা  ক্ষতিকর  ক্যামিকেল  ঔষধ  খাওয়ানোর  পর  দেখা  গেলো  যে,  আপনার  রক্ত  পরীক্ষার  রিপোর্ট  স্বাভাবিক  এসেছে।  ডাক্তার  বলবে,  এখন  আপনি  সুস্থ (!)  অথচ  বাস্তবে  আপনার  অবস্থা  আগে  চাইতেও  খারাপ  হয়ে  গেছে।  আবার  অনেক  সময়  ব্লাড  টেস্ট,  পায়খানা,  প্রস্রাব,  এক্সরে,  আল্ট্রাসনোগ্রাম,  ইসিজি,  এমআরআই,  সিটিস্ক্যান  ইত্যাদি  ইত্যাদি  অসংখ্য  টেস্ট  করে  রিপোর্ট  দেখে  বলবে,  আপনার  কোন  রোগই  নাই ;  অথচ  ব্যথার  চোটে  আপনার  দম  বেরিয়ে  যাচ্ছে,  ঘুম  হারাম  হয়ে  গেছে !  কেউ  কেউ  মনে  করতে  পারেন  যে,  এসব  প্যাথলজিক্যাল  টেস্টে  কেবল  টাকা  নস্ট  হয়  কিন্তু  শরীরের  কোন  ক্ষতি  হয়  না।  কিন্তু  এটি  বিরাট  ভুল  ধারণা।  রক্ত  পরীক্ষার  জন্য  সুই  দিয়ে  ছিদ্র  করে  যখন  রক্ত  বের  করা  হয়,  তাতে  আপনার  শরীরের  অনেকগুলো  স্মায়ু  কোষ  (nerve  cell)  ছিড়ে  যায়।  ফলে  স্নায়ুতে  উত্তেজনার (upheaval) সৃষ্টি  হয়। 

            আপনি  যত  বেশী  ইনজেকশান  নিবেন  অথবা  শরীরের  উপর  ছুরি-চাকু (surgical procedure)  ব্যবহার  করবেন,  স্নায়ুতন্তুতে  তত  বেশী  উত্তেজনার  সৃষ্টি  হবে।  এভাবে  বেশী  বেশী  উত্তেজনার  ফলে  আপনার  কোষতন্তুতে  বিদ্রোহ (revolt)  দেখা  দিবে।  আর  ডাক্তারী  ভাষায়  কোষতন্তুর (tissue)  বিদ্রোহকে  বলা  হয়  ক্যান্সার (cancer)।  হ্যাঁ,  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  মনে  করেন  যে,  বিভিন্নভাবে  আঘাতের  মাধ্যমে  স্নায়ুতন্তুকে  উত্যক্ত  করাই  ক্যান্সারের  মূল  কারণ।  তারপর  আসে  এক্স-রে।  বেশী  বেশী  এক্স-রে  করলে  ক্যান্সার  হয়,  এটি  বহু  পুরনো  কথা।  আল্ট্রাসনোগ্রাম  করা  হয়  খুবই  সূক্ষ্মমাত্রার  শব্দ  তরঙ্গ (micro  wave)  ব্যবহার  করে,  যারা  এমনকি  জীবাণুকে  পযর্ন্ত  ধ্বংস  করতে  পারে।  কাজেই  এটিও  আপনার  শরীরের  ক্ষতি  করে  থাকে  এবং  শরীরের  মধ্যে  থাকা  উপকারী  জীবাণুকেও  হত্যা  করতে  পারে।  এমআরআই,  সিটিস্ক্যান  হলো  এক  ধরণের  এক্স-রে।  কাজেই  এগুলো  শরীরে  ক্যান্সার  হওয়ার  সম্ভাবনা  বাড়িয়ে  দেয়  বহুগুণে।  এমআরআই (Magnetic resonance imaging-MRI)  টেস্ট  করার  সময়  আপনার  মৃত্যু  এবং  অন্যান্য  বড়  ধরনের  ক্ষতিও  হতে  পারে।  যাদের  হার্টে  পেসমেকার (Pacemakers)  বা  শরীরে  অন্যকোন  ধাতব  যন্ত্রপাতি  ফিট  করা  আছে,  তাদের  এমআরআই  করা  নিষিদ্ধ।

            স্তন  ক্যান্সার  নির্ণয়ের  জন্য  মেমোগ্রাফী (Mammography)  নামে  একটি  টেস্ট  করা  হয়,  যাতে  স্তনকে  একটি  যন্ত্রের  মাধ্যমে  চেপে  ধরে  বিভিন্ন  এংগেলে (angle)  কয়েকটি  এক্স-রে  করা  হয়।  এই  টেস্ট  করতে  যেহেতু  রেডিয়েশন (X-ray)  ব্যবহৃত  হয়,  তাই  এতে  ক্যান্সার  হওয়ার  ঝুঁকি  আছে  ষোলআনা।  পত্র-পত্রিকা-রেডিও-টিভিতে  প্রায়ই  বিজ্ঞাপন  দেওয়া  হয়  যে,  তাড়াতাড়ি  স্তন  ক্যান্সার  সনাক্ত (early  detection)  করার  জন্য  প্রতিটি  সচেতন  নারীর  উচিত  বছরে  একবার  করে  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করা।  অথচ  আপনি  যদি  দুই/চার  বার  মেমোগ্রাফী  করেন,  তবে  মেমোগ্রাফী  টেস্টের  কারণেই  বরং  আপনি  আরো  আগে  স্তন  ক্যান্সারে  আক্রান্ত  হবেন।  কেননা  রেডিয়েশানই (radiation)  হলো  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হওয়ার  একটি  বহুল  প্রমাণিত  বড়  কারণ।  বলা  হয়ে  থাকে,  যখন  থেকে  চিকিৎসা  ক্ষেত্রে  এক্স-রে (X-ray)  চালু  হয়েছে,  তখন  থেকেই  ক্যান্সারের  হার  বৃদ্ধি  পেয়েছে  দ্রুতগতিতে।  বিশেষজ্ঞদের  মতে,  একজন  মহিলা  যদি  বছরের  একবার  করে  ১০  বছর  মেমোগ্রাফী  করে,  তবে  সে  যে  পরিমাণ  রেডিয়েশনের  শিকার  হবে,  তা  হিরোশিমার  এটম  বোমার  রেডিয়েশনের  প্রায়  অধের্ক।  এই  কারণে  ১৯৭৬  সালে  আমেরিকান  ক্যানসার  সোসাইটি  এবং  ন্যাশনাল  ক্যানসার  ইনিষ্টিটিউট  তাদের  এক  ঘোষণায়  অপ্রয়োজনে  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করাতে  সবাইকে  নিষেধ  করেছেন।  তাছাড়া  এই  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  অধিকাংশ  ক্ষেত্রে  ভুয়া  রিপোর্ট  দিয়ে  থাকে।  ক্যানসার  না  থাকলে  বলবে  আছে  আবার  ক্যানসার  থাকলে  বলবে  নাই ;  অন্যদিকে  নরমাল  টিউমারকে  বলবে  ক্যানসার  এবং  ক্যানসারকে  বলবে  নরমাল  টিউমার।  ১৯৯৩  সালের  ২৬  মে  আমেরিকান  মেডিক্যাল  এসোসিয়েশনের  জার্নালে  প্রকাশিত  একটি  গবেষণায়  বলা  হয়েছে  যে,  মেমোগ্রাফী  টেস্টে  ২০%  থেকে  ৬৩%  ক্ষেত্রে  ভুল  রিপোর্ট  আসতে  পারে।  কাজেই  নিয়মিত  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করতে  বিজ্ঞাপন  দিয়ে  নারীদের  উৎসাহিত  করা  নেহায়েত  হাস্যকর  ধান্ধাবাজি  ছাড়া  আর  কিছুই  না। 

       ক্যান্সার  নির্ণয়ের  একটি  বহুল  ব্যবহৃত  পরীক্ষা  পদ্ধতির  নাম  হলো  বায়োপসী (biopsy),  যাতে  টিউমারের  ভেতরে  সুই  ঢুকিয়ে  কিছু  মাংস  ছিড়ে  এনে  মাইক্রোষ্কোপের  নীচে  রেখে  পরীক্ষা  করা  হয়,  তাতে  ক্যান্সার  কোষ  আছে  কিনা ।  কিন্তু  সমপ্রতি  বিজ্ঞানীরা  প্রমাণ  পেয়েছেন  যে,  এভাবে  টিউমারকে  ছিদ্র  করার  কারণে  সেই  ছিদ্র  দিয়ে  ক্যান্সার  কোষ  বেরিয়ে  দ্রুত  সারা  শরীরে  ছড়িয়ে  পড়ে (metastasis)।  তখন  ক্যানসার  রোগীর  অবস্থা  শোচনীয়  হয়ে  যায়  এবং  তাদেরকে  বাচাঁনো  অসম্ভব  হয়ে  পড়ে।  কেননা  টিউমারগুলো  আসলে  ক্যান্সার  নামক  এই  ভয়ঙ্কর  বিষাক্ত  পদার্থকে  চারদিক  থেকে  গ্রেফতার  করে,  বন্দি  করে  রাখে।  ইহা  হলো  ক্যানসারের  হাত  থেকে  নিজেকে  রক্ষা  করার  একটি  প্রাকৃতিক  প্রতিরক্ষা  ব্যবস্থা (natural  defense)।  ফলে  ইহারা  সহজে  সারা  শরীরে  ছড়াতে  পারে  না।  কিন্তু  পরীক্ষা-নিরীক্ষার  নামে  ছিদ্র  করে  তাদেরকে  ছড়িয়ে  পড়ার  সুযোগ  করে  দেওয়া  একটি  জঘন্য  মূর্খতাসুলভ  কাজ। তারপর  এই  বায়োপসীতে  ক্যানসার  নির্ণয়ের  ১০০%  নিশ্চয়তা  নাই।  প্রায়ই  মিথ্যা  পজিটিভ  অথবা  ভুয়া  নেগেটিভ  রিপোর্ট  আসে।  অনেক  বিজ্ঞানীর  মতে,  ডাক্তাররা  নারীদের  জরায়ু  মুখের  রস (Pap smears)  নিয়ে  মাক্রোষ্কোপে  নীচে  যে  পরীক্ষা  করেন  যে  জরায়ু  মুখে (cervix)  কোন  অসুখ  আছে  কিনা,  তা  পুরোপুরি  একটি  ভুয়া  কারসাজি।  এসব  ভুয়া  টেস্টের  মাধ্যমে  স্ত্রীরোগ  বিশেষজ্ঞরা (gynaecologist)  নারীদেরকে  বায়োপসী  এবং  সাজারীর  দিকে  নিয়ে  যায়  এবং  নিজেদের  পকেট  ভারী  করে।

            আরেকটি  টেস্ট  হলো  সিডি  ফোর  টেস্ট  (CD 4 Test)  যা  এইডস  রোগীদের  ওপর  এন্টিভাইরাল  ঔষধ  কতটা  কাজ  করছে,  জানার  জন্য  করা  হয়ে  থাকে।  কিন্তু  ল্যানসেট  নামক  মেডিক্যাল  জার্নালে  প্রকাশিত  এক  গবেষণায়  বিজ্ঞানীরা  দাবী  করেছেন  যে,  সিডি  ফোর  টেস্টের  কোন  বৈজ্ঞানিক  ভিত্তি  নাই।  তারপরও  এই  ভুয়া  টেস্ট  (বিষাক্ত  এবং  বাজে  সব)  এইডস  ড্রাগের  তথাকথিত  কাযর্কারিতা  প্রমাণের  জন্য  ডাক্তাররা  সমানে  করে  চলেছেন !  নিরপেক্ষ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  হেপাটাইটিস-সি (hepatitis C virus)  নামে  কোন  ভাইরাসের  অস্তিত্বই  নাই।  অথচ  বাস্তবে  হেপাটাইটিস-সি  ভাইরাসের  নামে  নানারকম  টেস্ট  করা  হচ্ছে  এবং  তাদের  জন্য  টিকাও (vaccine)  দেওয়া  হচ্ছে।  সভ্য  জগতে  এসব  গাজাঁখুড়ি  কারবার  কিভাবে  চলছে,  আল্লাহ্  ছাড়া  কেউ  বলতে  পারবে  না !  আরেকটি  জঘন্য  কারবার  হলো  স্ক্যানিং (scanning) ;  যেমন-  সিটি  স্ক্যান (CT scans),  ক্যাট  স্ক্যান (CT scans),  থাইরয়েড  স্ক্যানিং (thyroid  scaning)  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  স্ক্যানিং-এ  যেহেতু  এক্স-রে  বা  রেডিয়েশান  ব্যবহৃত  হয়,  তাই  এতে  ক্যানসার  হওয়ার  সম্ভাবনা  বেড়ে  যায়  এবং  সারা  শরীর  স্ক্যানিং  সবচেয়ে  বিপজ্জনক।  বিজ্ঞানীদের  মতে,  সামান্য  একটা  মাত্র  এক্স-রে  আপনার  শিশুর  মস্তিষ্কের (brain)  এত  ক্ষতি  করতে  পারে  যে,  (বুদ্ধিপ্রতিবন্দ্বি  হয়ে)  তার  জীবনটাই  ধ্বংস  হয়ে  যেতে  পারে।

            নিরপেক্ষ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  চিকিৎসা  ক্ষেত্রে  যদি  আইন-কানুনের  কড়াকড়ি  থাকতো,  তবে  অবশ্যই  সিগারেটের  প্যাকেটের  “ধূমপান  ফুসফুসে  ক্যানসার  সৃষ্টি  করে” এর  মতো  এইডস  বা  এইচআইভি  টেস্টের (HIV tests)  রিপোর্টেও  “এই  টেস্টে  ১০০  ভাগ  নিশ্চিত  করে  বলা  যায়  না  যে,  আপনি  এইডস  ভাইরাসে  আক্রান্ত  হয়েছেন  কি  হন  নাই”  ধরনের  স্বীকারোক্তি  লেখা  থাকতো।  যেখানে  টেস্টের  রিপোর্টেরই  কোন  গ্যারান্টি  নাই,  সেখানে  সেই  রিপোর্টের  উপর  ভিত্তি  করে  ভয়ঙ্কর-বিষাক্ত  সব  ঔষধ  প্রয়োগের  মাধ্যমে  কোটি  কোটি  বনি  আদমকে  কবরে  পাঠানো  গণহত্যা  ছাড়া  আর  কি  বলা  যায়।  এই  জন্যই  অনেক  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  এইচআইভি  টেস্টকে  এই  যুগের  হিটলারের  ইহুদী  নিধনের (holocaust)  ঘটনার  সাথে  তুলনা  করেছেন।  আরেকটি  ভুয়া  টেস্ট  হলো  পিএসএ  টেস্ট  (PSA-prostate  specific  antigen)  যা  পুরুষদের  প্রস্টেট  গ্ল্যান্ডের  ক্যানসার  নির্ণয়ের  করা  হয়ে  থাকে।  যেহেতু  এটি  শতকরা  ৫০  ভাগ  ক্ষেত্রে  ভুয়া  রেজাল্ট  দিয়ে  থাকে,  সেক্ষেত্রে  এই  রিপোর্টের  ওপর  ভিত্তি  করে  অপারেশন (prostatectomy)  বা  রেডিয়েশান (radiotherapy)  প্রভৃতি  চিকিৎসা  নিয়ে  অগণিত  পুরুষ  অকালে  অযথা  যৌন  অক্ষমতা (impotence),  প্রস্রাব  ধরে  রাখার  অক্ষমতা (incontinence)  ইত্যাদি  রোগে  আক্রান্ত  হয়ে  থাকেন।  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  পুরুষদের  প্রস্টেট  গ্ল্যান্ডের  ক্যানসার  অধিকাংশ  ক্ষেত্রেই  একটি  ভুয়া  রোগ,  ইহার  চিকিৎসা  করার  চাইতে  বরং  না  করলে  আরো  বেশী  দিন  আয়ু  পাওয়া  যায়।  শুধু  পিএসএ  টেস্টই  নয়,  বিজ্ঞানীদের  মতে  সকল  প্রকারের  এন্টিবডি (Antibody) টেস্টই  ভুয়া  থিওরীর  ওপর  প্রতিষ্ঠিত  এবং  সঙ্গত  কারণেই  ভুয়া  রিপোর্ট  প্রদানকারী।

            গবেষকদের  মতে,  যক্ষা  রোগ  নির্ণয়ের  চর্ম  পরীক্ষা (TB  test / Mantoux  test / MT  test)ও  একটি  ক্ষতিকর  এবং  ভুয়া  টেস্ট  যা  অধিকাংশ  ক্ষেত্রে  মিথ্যা  পজিটিভ  রিপোর্ট  দিয়ে  থাকে।  ফলে  এই  ভেজাল  রিপোর্টের  ভিত্তিতে  পরবতীর্র্তে  মানুষকে  যে  চিকিৎসা  দেওয়া  হয়,  তাতে  কেবল  সে  একা  নয়  বরং  তার  বংশশুদ্ধ  যক্ষা  রোগীতে (tubercular  miasm)  পরিণত  হয়।  অথচ  দাবী  করা  হয়  যে,  এমটি  টেস্ট  কোন  ক্ষতি  করে  না  এবং  একই  সাথে  এটি  যক্ষার  প্রতিষেধক  হিসাবে  কাজ  করে।  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসায়  এলার্জি,  হাপানি,  বাত (rheumatism),  স্মায়বিক  ব্যথা (neuralgia) ইত্যাদি  রোগ  না  সারলেও  এসব  রোগ  নির্ণয়ের  নামে  তারা  মাল  কামানোর  জন্য  অনেক  কষ্টদায়ক  পৈশাচিক  টেস্ট-ফেস্ট  ‍আবিষ্কার  করেছেন।  যেমন-  ইলেক্ট্রনিক  শক  টেস্ট  (EDS -electrodermal testing)।  কিছু  কিছু  টেস্টে  শরীরের  বিভিন্ন  স্থানে  আলপিন  ঢুকানো  হয়  আবার  কিছু  কিছু  ক্ষেত্রে  হাত-পায়ের  চামড়ার  নীচে  বৈদ্যুতিক  তার  ঢুকিয়ে  ইলেকট্রিক  শক  দেওয়া  হয়।  এতে  ছেলে-বুড়ো  সকলেই  ব্যথার  চোটে  ব্যাঙের  মতো  লাফ  দিয়ে  ওঠে।

       মহিলারা  গভর্ধারণ  করলে  আর  কোন  রক্ষা  নাই।  গাইনী  ডাক্তাররা  তাদেরকে  পায়খানা,  প্রস্রাব,  রক্ত,  এক্স-রে,  আলট্রাসনোগ্রাম  ইত্যাদি  ইত্যাদি  এক  বস্তা  টেস্ট  করতে  দিবেন।  কিন্তু  কেন ?  গভর্ধারণ  করা  কি  কোন  অপরাধ ?  ববরর্তার  একটা  সীমা  থাকা  দরকার !  তারপর  দিবে  এক  বস্তা  ঔষধ / ইনজেকশান / ভ্যাকসিন,  মাসের  পর  মাস  খেতে  থাক !  কেন  ?  এখন  আমরা  তো  সবাই  স্বচক্ষেই  দেখি,  জিওগ্রাফী / ডিসকভারী  টিভি  চেনেলগুলোতে,  গরু-ছাগল-হরিণ-বাঘ-সিংহ-হাতি  সবাই  গর্ভধারণ  করছে  এবং  সুস্থ-সুন্দর  বাচ্চা  জন্ম  দিচ্ছে।  কই,  তাদের  তো  গাইনী  ডাক্তারদের  কাছেও  যেতে  হয়  না,  এক  বস্তা  টেস্টও  করতে  হয়  না,  মাসকে  মাস  ঔষধও  খেতে  হয়  না  কিংবা  সিজারিয়ান  অপারেশানও  লাগে  না।  হাস্যকর  কিছু  বললাম ?  না,  আসলে  আত্মিক  এবং  বুদ্ধিবৃত্তিক  দিক  থেকে  আমরা  ভিন্ন  হলেও  জৈবিক  দিক  দিয়ে  কিন্তু  পশু-পাখিদের  সাথে  আমাদের  কোন  পার্থক্য  নাই।  প্রচলিত  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  পদ্ধতির  নিষ্টুরতার  সবচেয়ে  বেশী  শিকার  হয়ে  থাকেন  ডায়াবেটিস  রোগীরা।  সুগার  টেস্ট  করতে  করতে  আর  ইনসুলিন  ইনজেকশান  নিতে  নিতে  তাদের  শরীর  একেবারে  ঝাঝড়া  হয়ে  যায়,  চালুনির  মতো  ছিদ্র  ছিদ্র  হয়ে  যায়।  অথচ  আমরা  অনেকেই  জানি  না  যে,  এলোপ্যাথিতে  ডায়াবেটিসের  কোন  কাযর্কর  চিকিৎসাই  নাই।  আপনি  যদি  ডায়াবেটিসের  জন্য  দশ  বছর  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  নেন,  তবে  আপনার  লিভার-কিডনী-হার্ট-চোখ  ইত্যাদি  ড্যামেজ  হয়ে  নিশ্চিতভাবেই  কবরের  বাসিন্দা  হয়ে  যাবেন।    

            অধিকাংশ  ডাক্তাররা  মহিলাদেরকে  তাদের  স্তনে  টিউমার/ ক্যানসার  হলো  কিনা  সে  বিষয়ে  সচেতন  করার  জন্য  কিছুদিন  পরপর  নিজেদের  স্তন  নিজেরাই  টিপে  টিপে  (তাতে  কোন  চাকা  আছে  কিনা)  পরীক্ষা  করার  জন্য  পরামর্শ  দিয়ে  থাকেন ।  আসলে  এভাবে  রোগের  বিরুদ্ধে  সচেতনতা  সৃষ্টির  নামে  ডাক্তাররা  বরং  মানুষের  মধ্যে  ভীতির  সৃষ্টি  করেন  এবং  এতে  করে  স্তন  টিউমার/ ক্যানসারের  আক্রমণের  হার  আরো  বৃদ্ধি  পেয়ে  থাকে।  বাস্তবে  দেখা  গেছে,  টিভিতে  ব্লাড  প্রেসারের (hypertension) অনুষ্টান  দেখে  ভয়ের  চোটে  আরো  বেশী  বেশী  মানুষ  ব্লাড  প্রেসারে  আক্রান্ত  হচ্ছে ।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  ক্যানসারে  আক্রান্ত  রোগীদের  ওপর  গবেষণা  করে  দেখেছেন  যে,  অধিকাংশ  ক্যানসার  রোগীর  মনেই  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হওয়ার  অনেক  বছর  পূর্ব  থেকেই  ক্যানসারের  প্রতি  একটি  ভয়  কাজ  করত ।  এবং  এই  অস্বাভাবিক  ক্যানসার  ভীতি  তাদেরকে  শেষ  পযর্ন্ত  ক্যানসারের  শিকারে  পরিণত  করেছে ।  কাজেই  আপনার  সত্মনে  যখন  টিউমার / ক্যানসার  হবে,  তখন  এটি  এমনিতেই  চোখে  পড়বে ।  এজন্য  ভয়ে  ভয়ে  রোজ  রোজ  টিপে  টিপে  দেখার  কোন  প্রয়োজন  নাই।  একইভাবে  চিকিৎসা  বিষয়ক  যাবতীয়  বিজ্ঞাপন  থেকে  সযত্নে  একশ  মাইল  দূরে  থাকা  সকলেরই  উচিত  বলে  বিশেষজ্ঞরা  মনে  করেন ।

 

তথ্যসূত্রঃ ডাঃ  বশীর  মাহমুদ  ইলিয়াস

About The Author

DR. MOHAMMAD SHARIFUL ISLAM

নামঃ- ডা. মোহাম্মদ শরীফুল ইসলাম হোমিও হল সংক্ষিপ্ত নামঃ এস এই হোমিও হল

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